गुप्त/ यौन रोगों का परामर्श एव आयुर्वेदिक उपचार

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सेक्सो

जे एन क्लिनिक, देवरिया सेक्सोलोजी रोगों इरेक्टाइल डिसफंक्शन, समय पूर्व स्खलन, मेल इनफर्टिलिटी, धातु में कमी, जननांग का पूर्ण विकास ना होना, एजोपर्मिया, सेक्स अनिक्षा, डायबिटीज निरपेक्षित सेक्सुअल रोग का आयुर्वेदिक उपचार प्रदान करने के लिए संकल्पित हैं जे एन क्लिनिक में आपके रोगों के लक्षण को एक्सपर्ट द्वारा निरिक्षण के पश्चात प्राकृतिक एवं मॉडर्न आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के माध्यम से सेक्स सम्बन्धी रोगों का इलाज प्रदान करती हैं |

हमारे यहाँ नैतिक तरीके से जांच की करवाई की जाती हैं और उसके आधार पर रोग निदान की जाती हैं ताकि सही दवाइयां सही समय पर शरीर पर असर कर सके और आपकी यौन रोग की विषमताए दूर हो पाए

हमारे यहा गुप्त रोगों के लिए क्लीनिक में एक्सपर्ट एडवाइस के साथ दवाए भी उचित मूल्य पे उपलब्धहैं । अगर आप किसी भी प्रकार निचे दिए निम्नाकित यौन रोगों से ग्रषित हैं और उपचार हेतु संपर्क करना चाहते हैं, तो जे एन क्लिनिक आपको विशेषकृत आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रदान करने हेतु संकल्पित हैं |

एस टी डी

  • औरतों में योनि के आसपास खजली और /अथवा योनि से स्राव
  • पुरूषों मे लिंग से स्राव
  • सम्भोग के समय अथवा मूत्र त्याग के समय पीड़ा
  • जननेन्द्रिय के आसपास पीड़ाविहीन लाल जख्म
  • मुलायम त्वचा के रंग वाले मस्से जननेन्द्रिय के आसपास हो जाते हैं।
  • गुदा परक सम्भोग वालों को गुदा के अन्दर और आसपास पीड़ा
  • असामान्य छूत के रोग, न समझ आने वाली थकावट, रात को पसीना और वजन का घटना।

उपदंश

  • रोगजनक जीवाणु ट्रिपोनिमा पैलिडम
  • स्पाइरोकीटा पैलिडम
  • अस्थानीय परस्पर संबंधो या कइ पार्टनर द्वारा सेक्स संबंध के कारण उत्पन्न जीवाणु एवं रोग का उपचार

प्राथमिक उपदंश

प्राथमिक उपदंश प्राय: जननेंद्रियों पर प्रकट होता है। कभी कभी गुदाद्वार, जिह्वा, ओंठ और स्तन तथा डाक्टर नर्स और दाँतसाज़ों की उँगलियों पर भी हो जाता है। इसका उद्भवन काल (incubation period) सामान्यत: २१ दिन का होता है परंतु यह १० से ९० दिन तक का हो सकता है। प्राय: यह इतना कष्टदायी नहीं हुआ करता कि रोगी इसे बहुत महत्व दे। जननेंद्रिय पर या अन्यत्र कहीं, जीवाणुप्रवेश-स्थल पर, कड़ा, छोटा व्राण बनता है, जिस रतिज व्राण (chancre) कहते हैं तथा उसके पास की लसीकाग्रंथि फूल जाती है

द्वितीयक उपदंश

प्राथमिक उपदंश व्राण के उत्पन्न होने के ४८ घंटों के अंदर रोगजनक जीवाणु शरीर के सारे अंगों, त्वचा, श्लेष्मकला, नेत्र तथा तंत्रिकाओं में पहुँचकर तेजी से बढ़ने लगते हैं। रतिज प्राथमिक व्राण के होने के ६ सप्ताह बाद द्वितीयक उपदंश के लक्षण शरीर में उत्पन्न होते हैं। त्वचा या श्लेष्मकला का उद्भेदन (eruption) होता है। गुदा तथा ओंठ के पास जहाँ आर्द्रता रहती है वहाँ उद्भेदन अधिक होता है, जिसे कॉन्डिलोमा (Condyloma) कहते हैं। साथ ही ओंठों का कटना, गले तथा टांसिल में प्रदाह, हाथ पाँव और जोड़ों में हल्का दर्द, हरारत, सुस्ती, आँखों में जलन आदि शिकायत रहती है

गुप्त उपदंश

उपदंश के लक्षणों के लुप्त हेने के बाद रोगी को उपदंश का कोई कष्ट कुछ काल तक महसूस नहीं होता। ऐसे रोगियों को बहुधा गुप्त उपदंश हो जाता है। गुप्त उपदंशग्रस्त गर्भवती स्त्रियों का गर्भ सम्यक्‌ उपचार के अभाव में गिर सकता है, या उत्पन्न शिशु को जन्मजात उपदंश होने की संभावना रहती है। प्रसवकाल में नीरोग रहने पर भी कुछ मास बाद शिशु में उपदंश के लक्षण प्रकट होने लगते हैं। उचित चिकित्सा होने पर भी शिशु का भविष्य अरक्षित रहता है। चिकित्सा के अभाव में शिशु विकारग्रस्त होगा, जैसे माथा ऊँचा नेत्र फूले हुए, चिपटी नाक, दंतविकार, बहरापन, मुखद्वार के आसपास फटने तथा दरार पड़ने या घाव भरने के चिह्न, धनुषाकार जंघास्थि। उपदंश की ठीक चिकित्सा न होने पर प्राय: २५ प्रतिशत लोगों को भावी जीवन में गुप्त उपदंश हो जाता है, जिससे उनकी मृत्यु तक हो सकती है।

  • सुजाक
  • शीघ्रपतन
  • इरेक्टाइल डिसफंक्शन
  • वीर्य में कमी
  • लिंग में तनाव ना आना

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